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मुख्‍य पृष्‍ठ भारत में जल विज्ञान की स्थापना

भारत में जल विज्ञान की स्थापना

पर्याप्त अश्मवैज्ञानिकी तथा कालक्रमिक विविधताओं सहित विभिन्न भूवैज्ञानिकी संरचनाओं, जटिल विवर्तनिक ढांचे, जलवायु संबंधी असमानताओं तथा भिन्न जल रासायनिक परिस्थितियों के कारण भारतीय उपमहाद्वीप में भूजल की प्रकृति काफी जटिल है। वर्षों के अध्ययन से यह बात सामने आई है कि जलोढ़/हल्के चट्टानों में जलभृत समूह सतह पर थाले की सीमाओं से भी ऊपर है। भूजल की विभिन्न द्रवीय विशिष्टताओं के आधार पर चट्टानी संरचनाओं को मुख्य तौर पर दो समूहों में विभक्त किया जा सकता है। सरंध्र संरचनाएं तथा विदारित संरचनाएं-

1.1 सरंध्र संरचनाएं

सरंध्र संरचनाओं को संपिंडित और असंपिंडित संरचनाओं के रूप में विभाजित किया जाता है।

1.1.1 असंपिंडित संरचनाएं

नदी थालों, तटीय और डेल्टा प्रदेशों के जलोढ़क अवसादों से आच्छादित क्षेत्र असंपिंडित संरचनाओं का निर्माण करते हैं। बड़े पैमाने और गहन विकास के लिए सबकी तुलना में यह सर्वाधिक महत्वपूर्ण भूजल जलाशय हैं। भूजल वैज्ञानिकी वातावरण तथा भूजल क्षेत्र की परिस्थितियों से सिन्धु-गंगा-ब्रह्मपुत्र थाले में मीठे भूजल की बहुलता वाले संभावित जलभृतों की मौजूदगी के संकेत मिलते है। इस इलाके में काफी अधिक मात्रा में वर्षा होने तथा सरंध्र असादों की अच्छी उपलब्धता होने की वजह से ये भूजल जलाशय हर वर्ष भरते हैं जिसका काफी प्रयोग हो रहा है। इन क्षेत्रों में जल स्तर के उतार चढाव (सक्रिय भूजल संसाधन) वाले क्षेत्रों में उपलब्ध भूजल संसाधनों के वार्षिक पुनर्भरण के साथ ही उतार-चढ़ाव वाले क्षेत्र के नीचे विशाल भूजल संचयन पुनर्भरण क्षेत्र है तथा इससे भी गहरे छिपे जलभृत हैं जिनका सामान्यतः दोहन नहीं किया गया है। हालांकि मुख्य तौर पर कुओं, बोरवेल तथा खुदाई और पोखरों के जरिए भूजल निकासी की जाती है लेकिन पिछले कुछ दशकों मे हजारों नलकूपों का निर्माण किया गया है।

1.1.2 अर्द्ध संपिंडित संरचनाएं

अर्द्ध संपिंडित संरचनाएं आम तौर पर संकरी घाटियों अथवा संरचनात्मक रूप से त्रुटिपूर्ण थालों में पाई जाती हैं। गोंडवाना, लाठी, टिपम्स, कुट्टालोर बलुआ पत्थर और इनके समरूप सुप्रवाही कुओं का निर्माण करते हैं। पूर्वोत्तर भारत के चनिंदा भूभागों में ये जलधारी संरचनाएं काफी ऊर्वर हैं। सामान्यतः रेतीले ऊपरी गोंडवाना बहुलोत्पादक जलभृतों का निर्माण करते हैं।

1.2 विदारित संरचनाएं (संपिंडित संरचनाएं)

देश के लगभग दो-तिहाई भाग विदारित संरचनाओं से लैस हैं। स्फोटगर्ती ज्वालामुखीय शैल के अतिरिक्त संपिंडित संरचनाओं में संरध्रतः नगण्य होती है। भूजलवैज्ञानिक दृष्टिकोण से विदारित संरचनाओं को मौटे तौर पर चार प्रकार से वर्गीकृत किया जा सकता है- ज्वालामुखीय एवं कार्बोनेट शैल के अतिरिक्त आग्नेय एवं कायांतरित शैल, ज्वालामुखी शैल, संपिंडित अवसादीय शैल तथा कार्बोनेट शैल।

1.2.1 ज्वालामुखीय एवं कार्बोनेट शैलों के अतिरिक्त आग्नेय एवं कायांतरित शैल

ग्रेनाइट, नीस, चार्नोकाइट, खोंडालाइट, क्वार्टजाइट, शिस्ट तथा फाइलाइट, स्लेट आदि सामान्य शैल के प्रकार हैं। इन शैलों में सांध्रता मूलतः नगण्य होती है किंतु विभंजन एवं अपक्षयण के कारण इनमें सांध्रता तथा पारगम्यता का विकास होता है। भूजल उत्पादन क्षमता शैल के प्रकार तथा कायांतरण श्रेणी पर भी निर्भर करती है।

1.2.2 ज्वालामुखीय शैल

दक्कन पठार का बसाल्ट लावा प्रवाह मुख्य तौर पर ज्वालामुखीय शैल है। विभिन्न प्रवाह इकाईयों की विषम जलधारण विशिष्टताएं दक्कनी ट्रैप में भूजल उपलब्धता को प्रभावित करती हैं। प्राथमिक एवं द्वितीयक रंध्राकाश की मौजूदगी के तहत दक्कन ट्रैप में साधारणतः अल्प से मध्यम पारगम्यता होती है।

1.2.3 कार्बोनेट शैल के अतिरिक्त संपिंडित अवसादी शैल

संपिंडित अवसादी शैल कुडप्पा, विंध्य और इसके समकक्ष क्षेत्रों में पाए जाते हैं। इन संरचनाओं में संगुटिकाश्म, बलुआ पत्थर, स्लेट और क्वार्टजाइट शामिल हैं। संस्तरण तल, जोड़, संस्पर्श क्षेत्र एवं विभंगों की उपस्थिति भूजल की उपलब्धता, गतिविधि एवं उत्पादन क्षमता को प्रभावित करती है।

कुडप्पा, विंध्य और बिजावर शैल समूह में संगमरमर और डोलोमाइट के अतिरिक्त चूना पत्थर महत्वपूर्ण कार्बोनेट शैल है। कार्बोनेट शैलों में जल संचरण से घोल गुहिका का सृजन होता है जिससे जलभृतो की पारगम्यता में वृद्धि होती है। इसके परिणामस्वरूप कम दूरी पर अत्याधिक विषम पारगम्यता पाई जाती है।

1.3 भारत में भूजलवैज्ञानिक इकाई और संभाव्यता-

देश में भूजलवैज्ञानिक इकाई का विभाजन तालिका-I में दिया गया है।

तालिका-I. देश में भूजल इकाइयों का विभाजन एवं संभाव्यता

तालिका-I

देश में भूजल वैज्ञानिक इकाइयों का विभाजन एवं संभाव्यता

देश में भूजल वैज्ञानिक इकाइयों का विभाजन एवं संभाव्यता

भूवैज्ञानिक युग

शैल संरचनाएं

राज्य/भूजलवैज्ञानिक विशिष्टताएं

संपिंडित संरचनाएं

जुरासिक, उच्च क्रिटेशस काल से प्रादिनूतन युग

राजमहल ट्रैप, दक्कन ट्रैप

बसाल्ट, डॉलराइट, डायोराइट तथा बसाल्टिक मैगमा की अन्य अम्लीय व्युतपत्ति

पश्चिम बंगाल, झारखंड, मध्य प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक में प्राप्त होते हैं। 5 एलपीएस (लीटर प्रति सेकंड) तक का उत्पादन अपरिरुद्ध उथले जलभृत एवं क्षरण परिरुद्ध गहरे जलभृत

पूर्व कैंब्रियन

कुडप्पा, विंध्य, दिल्ली एवं समतुल्य प्रणाली

क) संपिंडिंत बलुआ पत्थर शैल, संगुटिका

ख) चूना पत्थर,डोलोमाइट

ग) क्वार्टजाइट, संगमरमर

घ) अंतर्बेधी ग्रेनाइट एवं मलानी ज्वालामुखीय

सभी राज्यों में पाए जाते हैं। ग्रेनाइट एवं ग्रेनाइट नीस सबसे अधिक उत्पादक जलभृत हैं।

प्राचीन युग

आर्कियन कॉम्पलेक्स

 

 

 

धारवाड, अरावली तथा समकक्ष संरचनाएं

क) ग्रेनाइट, नीस, चार्नोकाइट एवं खोंडालाइट

ख) शिस्ट, स्लेट, फिलाइट, ग्रेनुलाइट

ग) बेंडेड हेमाटाइट क्वार्टजाइट (लौह अयस्क श्रेणी)

 

अर्द्धसंपिंडित संरचनाएं

तृतीय युग

 

क) नुमुलाइटिक शैल तथा चूना पत्थर

ख) कार्बनिक शैल

ग) बलुआ पत्थर

घ)शेल

च)लोहमय बलुआ पत्थर

छ)गुटिका संस्तर और बोल्डर संगुटिका

ज)बालू

झ) चिकनी मिट्टी

इन संरचनाओं में भूजलवैज्ञानिक संभाव्यता केवल घाटी क्षेत्र से ही संबद्ध है। निचली शिवालिक और हिमाचल प्रदेश, जम्मू कश्मीर, असम, पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, सिक्किम में इसके समतुल्य साधारणतः संभाव्य जलभृत का निर्माण नहीं करते हैं। उपयुक्त थलाकृतिक स्थानों पर ऊपरी शिवालिक में सामान्य भूजल संभाव्यता है। राजस्थान, गुजरात, कच्छ, केरल, उड़ीसा, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल तथ पूर्वोत्तर राज्यों के तरझियरी बलुआ पत्थरों में सामान्य से सामान्यतः अच्छी उत्पादन संभाव्यता है

भूवैज्ञानिक युग

शैल संरचनाएं

राज्य/भूजलवैज्ञानिक विशिष्टताएं

प्रारंभिक कॉर्बनिक से जुरासिक

गोंडवाना

 

 

 

 

 

कच्छ और राजस्थान के जुरासिक बाघ संस्तर लमेटा और समतुल्य

क) बोल्डर-गुटिका संस्तर

ख)बलुआ पत्थर

ग)शेल

घ)कोयला संस्तर

क) बलुआ पत्थर

ख)चूनायुक्त बालुकाश्य

ग)शेल

घ)क्वार्टजाइट

ड़) चूना पत्थर

झारखण्ड, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, उड़ीसा, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, गुजरात, राजस्थान और तमिलनाडु में पाया जाता है। ये संरचनाएं क्षेत्रीय स्तर पर विस्तृत रूप में फैली हुई नहीं हैं। कार्स्टीफाइट चूना पत्थर की जल उत्पादक क्षमता अच्छी है।

बराकर और कामथी (निचला गोंडवाना) में चूर्णशील बलुआ पत्थर और इसके समतुल्य संरचनाओं में सामान्यत) अच्छी संभाव्यता है।

असपिंडिंत संरचनाएँ

अत्यंत नूतन से अब तक

क) सरिताहिमी निक्षेप

 

 

 

ख) हिम सरोवरीय निक्षेप

क) मिश्रित बोल्डर,अपालिका, बालू और गाद

ख)संगुटिका, बालू, बजरी, कार्बनयुक्त शैल और नील मृदा

सुदूर हिमालय में घाटी और गॉर्ज हिमाढ़ अवसादों द्वारा आच्छादित है। करेवा (कश्मीर घाटी) सरोवरी अवसाद है जिसमें मृत्तिका, गाद तथा स्थूल अवसाद सहित बोल्डर संस्तर शामिल हैं।

ग) पीडमॉन्ट तथा हिमालयी गिरी पद अवसाद

ग) बोल्डर, गोलाश्म, कंकड, ग्रेवल, संस्तर, गाद और मृत्तिका

भाभर पीडमॉन्ट बेल्ट में कई उत्पादक बोल्डर गोलाश्म-ग्रेवाल-बालू जलभृत शामिल । जल स्तर गहरा है जिससे दक्षिण में जलोढ़ मैदानी क्षेत्र के गहरे जलभृतों के लिए पुनर्भरण क्षेत्र का निर्माण होता है। तराई बेल्ट भाभर जलभृतों का निचले क्षेत्रों में विस्तार है। गहरे परिसीमित जलभृत आर्टिसन परिस्थिति प्रदर्शित करते हैं।

भूवैज्ञानिक युग

शैल संरचनाएं

राज्य/भूजलवैज्ञानिक विशिष्टताएं

 

घ) जलोढ़ मैदानी क्षेत्र (प्राचीन एवं नवीन जलोढ़क)

घ) मृत्तिका एवं गाद विभिन्न मिश्रण वाले बजरी और बालू। पीट एवं कार्बनिक पदार्थ कार्बोनेट एवं सिलिकामय सन्द्रण (कंकड़)

सिंधु-गंगा-ब्रह्मपुत्र जलोढ़ मैदानी क्षेत्र में वृहद् रूप से पाए जाते हैं और उच्च क्षमता वाले जलभृतों का निर्माण करते हैं। प्रायद्वीपीय नदियों जलोढ़क की क्षमता सामान्य होती है। परन्तु नर्मदा तापी, पुरना बेसिन की जलोढ़ घाटी भरण की 100 मीटर मोटी, उत्पादन क्षमता है। उत्तरी गतुजरात के बहुपरतीय जलभृत सामान्य से उच्च क्षमता वाले हैं। गहरे स्तर पर भूजल की गुणवत्ता कम होती जाती है। पूर्वी तट और गुजरात ज्वारनदमुखी क्षेत्र में प्रमुख नदियों के डेल्टा में मोटी जलोढ़ क्रम में लवणता जोखिम सहित भूजल वैज्ञानिकी क्षमता है।

 

ड़ अवसाद (बलुआ पत्थर)

ड़) अति सूक्ष्म से सूक्ष्म बालू और गाद

पश्चिमी राजस्थान, गुजरात, हरियाणा, दिल्ली, पंजाब में पाए जाने वाले अवसादों में सामान्य से उच्च उत्पादन क्षमता है, ये पारगम्य हैं और शुष्क क्षेत्र में अवस्थित हैं, इनका प्राकृतिक पुनर्भरण अच्छा नहीं है तथा जल स्तर गहरा है।